International Journal on Science and Technology

E-ISSN: 2229-7677     Impact Factor: 9.88

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भारतीय शहरी क्षेत्रों में सूक्ष्म-प्रदूषकों का विश्लेषण: अपशिष्ट जल उपचार प्रणालियों की प्रभावशीलता और पर्यावरणीय जोखिम

Author(s) Dr. Sarika Sharma
Country India
Abstract भारत के तीव्र शहरीकरण, जनसंख्या-वृद्धि, औषधीय उपभोग में विस्तार, व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों के बढ़ते उपयोग, और औद्योगिक-घरेलू अपशिष्ट के जटिल मिश्रण ने शहरी जल-प्रदूषण की प्रकृति को अत्यंत बहुआयामी बना दिया है। परंपरागत जल-गुणवत्ता मानकों—जैसे जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD), कुल निलंबित ठोस (TSS), pH, नाइट्रेट, फॉस्फेट आदि—के अतिरिक्त अब ऐसे सूक्ष्म-प्रदूषक (micro-pollutants) और उभरते प्रदूषक (emerging pollutants) गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं, जो अत्यल्प सांद्रता (ng/L से µg/L) पर भी जलीय पारिस्थितिक तंत्र तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकते हैं। इन सूक्ष्म-प्रदूषकों में फार्मास्युटिकल्स, व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद (PCPs), अंतःस्रावी व्यवधानकारी यौगिक (endocrine disrupting compounds), एंटीबायोटिक्स, हार्मोन, कृत्रिम सुगंध यौगिक, कीटनाशी अवशेष तथा कुछ संदर्भों में सूक्ष्म-प्लास्टिक/नैनो-प्लास्टिक संबंधी कण शामिल हैं। भारत के अधिकांश सीवेज उपचार संयंत्र (Sewage Treatment Plants, STPs) मूलतः कार्बनिक भार, निलंबित ठोस और रोगजनकों को कम करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं; वे इन जटिल रसायनों के पूर्ण निष्कासन के लिए अभिकल्पित नहीं हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य भारतीय शहरी नदी-तटीय क्षेत्रों—विशेषतः गंगा और यमुना तंत्र से जुड़े नगरों—में सूक्ष्म-प्रदूषकों की उपस्थिति, उनकी सांद्रता, STPs द्वारा उनके निष्कासन की वास्तविक क्षमता, तथा उनसे उत्पन्न पारिस्थितिक और स्वास्थ्यगत जोखिमों का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन एक बहु-पैरामीट्रिक ढाँचा प्रस्तावित करता है, जिसमें STPs के इनलेट और आउटलेट से नमूना-संग्रह, GC-MS और HPLC आधारित रासायनिक विश्लेषण, साथ ही पारंपरिक जल-गुणवत्ता सूचकांकों (COD, BOD, pH, आयनिक प्रोफ़ाइल) का तुलनात्मक परीक्षण सम्मिलित है। लेख यह दिखाता है कि यद्यपि पारंपरिक उपचार प्रक्रियाएँ BOD और COD में उल्लेखनीय कमी ला सकती हैं, तथापि अनेक सूक्ष्म-प्रदूषकों—विशेषकर फार्मास्युटिकल अवशेष, हार्मोनल यौगिक और कुछ स्थायी कार्बनिक रसायन—का निष्कासन आंशिक, अनियमित अथवा अपर्याप्त रहता है। मौसमीय परिवर्तन, हाइड्रोलिक लोड, जैविक सक्रियता, sludge retention time, तथा उपचार प्रौद्योगिकी की प्रकृति इन निष्कासन-दरों को प्रभावित करती है। लेख में यह भी विवेचित किया गया है कि इन रसायनों का जलीय जीवों पर विषैला प्रभाव, अंतःस्रावी व्यवधान, प्रतिजैविक प्रतिरोध (antibiotic resistance) की वृद्धि, तथा पेयजल स्रोतों के माध्यम से मानव स्वास्थ्य पर संभावित दुष्प्रभाव एक गंभीर नीति-चिंता का विषय हैं। उन्नत ऑक्सीकरण प्रक्रियाएँ (AOPs), मेम्ब्रेन बायोरिएक्टर (MBRs), ओजोनन, सक्रिय कार्बन, और फोटो-कैटेलिसिस जैसी तकनीकों को पारंपरिक STPs के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता रेखांकित की गई है। लेख निष्कर्षतः यह प्रतिपादित करता है कि भारत में जल-शोधन की नियामकीय और प्रौद्योगिकीय रूपरेखा को सूक्ष्म-प्रदूषकों के युग के अनुरूप पुनर्गठित किए बिना शहरी जल-सुरक्षा और पारिस्थितिकीय संरक्षण के लक्ष्य अधूरे रहेंगे।
Keywords सूक्ष्म-प्रदूषक, उभरते प्रदूषक, अपशिष्ट जल उपचार, फार्मास्युटिकल अवशेष, व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद, जलीय पारिस्थितिकी, GC-MS, HPLC, भारत, पर्यावरणीय जोखिम
Published In Volume 12, Issue 4, October-December 2021
Published On 2021-10-07
DOI https://doi.org/10.71097/IJSAT.v12.i4.10830

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