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E-ISSN: 2229-7677     Impact Factor: 9.88

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भूमि व्यवस्था पर धर्म आधारित शासनिक वैचारिकी के प्रभाव कौटिल्य से वर्तमान तक भारत की भूमि नीतियों की तुलनात्मक विवेचना

Author(s) Dr. राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल
Country India
Abstract अर्थव्यवस्था] सामाजिक स्थिरता] सत्ता नियंत्रण और कराधान में भूमि के महत्त्व को देखते हुए भूमि नीतियाँ सदैव शासन के केंद्र में रही हैं। यह आलेख भारत में वैदिकयुग से वर्तमान तक के शासन में धार्मिक दृष्टिकोण एवं इस कालावधि की भूमि नीतियों के प्रभाव को प्रस्तुत करता है। प्राचीन भारत में भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य और समुदाय का साझा स्वामित्व था। कौटिल्यीय भूमि व्यवस्था राज्य के नियंत्रणाधीन होकर न्याय एवं उत्तरदायित्व पर आधारित थी। परवर्ती कालखण्ड में भूमि व्यवस्था में धार्मिक एवं गैर&धार्मिक भूमि अनुदान] सामंती अधिकार] जागीरदारी एवं जमींदारी प्रथाएं पनपी। प्राचीन भारत के सामूहिक उत्तरदायित्व से उलट परतंत्र भारत में अब्राह्मिक शासकीय वैचारिकी की भेदभावपूर्ण भूमि नीतियां स्वार्थपूर्ण राजस्व संग्रहण के साथ निरंकुश सत्ता नियंत्रण का साधन बनी। ब्रिटिश शासन ने निजी ठेकेदारी से जोड़कर भूमि के क्रय&विक्रय को शासकीय मान्यता प्रदान की। इस शोध का प्रमुख उद्देश्य यह समझना है कि राज्य की भूमि नीतियों पर शासकों की धार्मिक विचारधारा का क्या प्रभाव रहा और ये आर्थिक समृद्धि एवं सामाजिक स्थायित्व में किस हद तक सहायक रही \ विशेषकर हिन्दू] इस्लामिक और ईसाईयत वैचारिकी की निरंतरता और विचलन से किस प्रकार भूमि व्यवस्थाएं परिवर्तित हुई \ स्वतंत्र भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सिद्धांततः भूमि नीतियाँ समता एवं सामाजिक न्याय पर आधारित होने के बावजूद इसमें आज भी क्रियान्वयन सम्बन्धी कई विसंगतियाँ विद्यमान हैं। प्राचीन ग्रंथों] ऐतिहासिक दस्तावेजों] औपनिवेशिक एवं संवैधानिक प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन एवं विश्लेषण स्पष्ट करता है कि प्रशासकीय तंत्र एवं सामाजिक न्याय में सत्ता की वैचारिकी परिलक्षित हुई है। निष्कर्षतः प्राचीन और मध्यकालीन शासन में मौजूद सकारात्मक तत्वों के समावेशन से आधुनिक भूमि व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाया जाना संभव है।
Keywords अब्राह्मिक] स्थायी बंदोबस्त] पंथ निरपेक्ष] ख़राज] महलवाड़ी] रैयतवारी। 3-प्रस्तावना
Field Sociology > Administration / Law / Management
Published In Volume 16, Issue 3, July-September 2025
Published On 2025-09-04
DOI https://doi.org/10.71097/IJSAT.v16.i3.8059

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